स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता ( उदाहरण अलंकार पर आधारित )
शीर्षक --प्रेम से दूर जा रहा
व्याख्या ---कवि के द्वारा जीवन में एकाकीपन का प्रभाव स्वयं के विकास करने के लिए इतना बढ़ गया है कि वह दिन प्रतिदिन अपनों से दूर जाता दिखाई पड़ रहा है कहानियों किताबों में जो प्रेम हम सुने हैं वर्तमान परिदृश्य में दिखाई नहीं पड़ रहा है इन समस्याओं का वर्णन किया गया है ।
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प्रेम से दूर जा रहा
एकाकीपन से घिरा मानव ,प्रेम से दूर जा रहा ।
वर्तमान का यह प्रसाद है ,पग पग वह पा रहा ।
समय ने उसको बांध रखा है, आवश्यकताएं बहुत है ।
हर पल वह जूझता दिखता, जीता जागता सबूत है ।
सब आवश्यकताओं ने ले लिया ,उसका गीत गा रहा ।
ज्यों ज्यों आगे बढ़ रहा वह,सब पीछे छूट रहे ।
प्रेम की जो कड़ियां बनी है, स्वार्थ में सब टूट रहे ।
आगे बढ़ने की धुन से ,न सुख दे रहा न सुख पा रहा ।
जिस प्रेम को सुन रखें है, कहां दिखाई देता है ।
जैसे हंसने की बात हो ,रुलाई दिखाई देता है ।
राम सुग्रीव कृष्ण सुदामा ,जैसे मित्रता न बन पा रहा ।
दूरी में अपनापन बरसे , देखो पास बिल्कुल नहीं ।
ऐसे मानव दुर्लभ जग में ,जिसके पास कोई सूल नहीं ।
जो अपने हैं अपनों को,वह अपना नहीं कह पा रहा ।
इसको हम विकास कहें, या पूरा सत्यानाश कहें ।
कह भी तो नहीं सक रहे,खास कहें या बकवास कहें ।
इसी में आगे बढ़े या रुकें निर्णय नहीं कर पा रहा ।
उन्नति के शिखर पर,जो दृश्य सामने उपस्थित हैं ।
मैं आपसे पूछता हूं, कितना उचित और अनुचित है ।
जो दृश्य मुझको दिखता, कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा ।
गिरधारी लाल चौहान
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