स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा - मुक्त,उदाहरण अलंकार
शीर्षक -
*आकर्षण नहीं प्रेम*
आकर्षक और सुंदरता के पीछे, दौड रही है आधुनिक पीढ़ी,
बना है प्रेम जैसे, समय बिताने का साधन,
सोशलमीडिया बना है माध्यम
अजनबियों को मिलाने का,
दौर चलता फिर परिचय का,
पल-भर में बन जाता नाता ।
प्रेम नहीं, मनोरंजन है जैसे
कुछ पल साथ बिताने का संबंध,
अहं जब टकराती है, हो जाती दोनों में अनबन,
सुंदरता लगने लगती बेमानी,
वर्तमान प्रेम की यही कहानी
फिर चलता आरोप प्रत्यारोप
हो जाता रिश्ता कमजोर।
पल भर भी रहता प्रेम अगर
कटुता ना आती वाणी में तब।
प्रेम समर्पण, प्रेम है त्याग जैसे मीरा ने किया कान्हा के साथ ।
नया दौर है नये विचार ,नयी हुई प्रेम परिभाषा,
कैसे जाने सच्चा प्यार जब संबंधों में हो स्वार्थ भरा ।।
अनुरमा शुक्ला
दुर्ग (छ.ग.)
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