स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा - मुक्त ,अतिशयोक्ति अलंकार
शीर्षक - *माँ का भय*
कहाँ छुपा लूँ
बिटिया तुझको
जमाने की बुरी
नजर से,
हर तरफ घूम रहे
दरिंदे
विश्वास करुं
किस पर,
रोक लूं घर के
अंदर तो
घर का दायरा
कहाँ सुरक्षित,
सोच सहम सी
मैं जाती हूं ।
उस अभागिन पर
क्या बिती होगी,
लूटी दामिनी के
लिये जब वह
माँ लड़ी होगी ।
घर से निकलने
से पहले ही अस्मत
लूट ली जाती है,
कुदृष्टि पड़ती
जब धृष्ट की
चीर तार-तार
हो जाती है,
पिता ,भाई जैसी
नजर अब पुरुषों में
नजर नहीं आती है।।
अटल निश्चय
है मेरा अब,
रखना नहीं आँचल
में छुपाकर,
तुम्हें लक्ष्मीबाई
बनाना है,
अपनी रक्षा खुद
ही करना
जमाने से तुझे
लड़ जाना है,
जीवन की हर
उलझन स्वयं
ही सुलझाना है ।।
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अतिशयोक्ति अलंकार
1 घर से निकलने के पहले अस्मत
2 कुदृष्टि पड़ते ही चीर तार-तार
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