स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (उदाहरण अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"पतित प्रेम"
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प्रेम अब साधना नहीं साधन हो गया
जैसे आंखों में काजल नहीं सुरमा चढ़ गया ।
बात अब प्यार की रह ही नहीं गई
जैसे मानों कमाई का जरिया हो गया ।
सात जन्मों की कसमें अब कहीं नहीं
बात-बात में अब तो तलाकनामा हो गया ।
खत पढ़ सहेज कर रखते थे कभी
मोबाइल में अब तो डिलीट मारना आ गया ।
प्यार दिलों को जोड़ा करती थी कभी
अब तो जैसे शरीर तक सिमट कर रह गया ।
जज्बात आंखों से बयां होते थे कभी
अब तो जैसे मुंह मारने का चलन हो गया ।
कुछ ना ही कहे पुष्पा अब तो अच्छा है
बहुत कुछ तो जुबान पर आ ही गया ।
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