Friday, September 4, 2020

बलौदाबाजार से लीलाधर कुम्हार की रचना- प्रेम का वर्तमान स्वरूप

रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदा बाजार (छ. ग. )
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - उदाहरण अलंकार
शीर्षक - प्रेम का वर्तमान स्वरूप

प्रेम अबूझ पहेली है ,
बिना परिचय की सहेली है ।
प्रेम की भाषा जादुई ,
समझनेवाले कोई - कोई ।
ज्यों जल काई से ढँका ,
त्यों आवरण में प्रेम छिपा ।
प्रेम तो सीधी - सच्ची है ,
पर वर्तमान में कच्ची है ।
प्रेम का उल्टा अर्थ लगाते ,
मोह - वासना में पड़ जाते ।
मतलब का मुखौटा पहने ,
लोग चले हैं प्यार निभाने ।
काम हो गया छोड़ो भाई ,
कौन करे अब प्रेम सगाई ?
बदनाम हो गई प्रेम बेचारी ,
प्रेम नहीं लाइलाज बीमारी ।
नायक - नायिका में आकर्षण ,
यही आज का प्रेम प्रदर्शन ।
प्रेम के पीछे धोखा है ,
ठग लेने का मौका है ।
पद पैसे और सत्ता वाले ,
आडम्बर का प्रेम रचाते ।
प्रेम की बोली भी लगती है ,
ऊँची कीमत में बिकती है ।
आज प्रेम बहुरूपिया है ,
नकली प्रेम तो साँप-चूहा है ।
प्रेम का पंछी कहाँ मिलेगा ?
बिना शर्त जहाँ प्रेम खिलेगा ।
प्रेम की असली परिभाषा ,
वर्तमान में नजर न आता ।
प्रेम हो गया खट्टा - खारा ,
निंदा कलह कपट ही प्यारा ।
इसीलिए है घोर अशांति ,
दुःख और पाप कभी नहीं जाती ।
प्रेम तो ईश्वर की प्रतिमूर्ति ,
सत् चित् आनंद की अनुभूति ।
माता पिता गुरु का प्रेम ,
लाते जीवन मे कुशल - क्षेम ।
असली प्रेम राज्य में आओ ,
अपना जीवन धन्य बनाओ ।

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