जिला :- महासमुंद
विषय :- वर्तमान परिदृश्य और प्रेम
शीर्षक :- मिलावटी प्रेम
विधा :- व्यंग्य कविता
अलंकार :- उदाहरण अलंकार
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पानी मिला अब दूध बिके,
मिठाई मिले मिलावटी फीके।
ज्यों जग में जन - मन में मिलावट,
मिलावटी ही प्रेम दिखे।
सच्चा प्रेम ही सभी को बाँटे,
चंगु - मंगु, बुधवारा।
ज्यों भौरा हर सुमन पर बैठे,
मनवा घूमता आवारा।
एक नहीं अनेक के पीछे,
करते निज के वक्त बर्बाद ।
जैसे पंडित मंदिर में देता,
हर जन में बाँटे प्रसाद।
अब तो हर मुख में खिलते हैं,
बस हल्की मुस्कान बनावटी।
हर हृदय है कलुषित,
पलता जिसमें प्रेम बनावटी।
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व्याख्या :- उपरोक्त रचना मे रचनाकार ने वर्तमान परिदृश्य में मिलावटी प्रेम का वर्णन किया है।
काव्य अलंकरण के लिए उदाहरण अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
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