Thursday, September 17, 2020

गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" कृत आलेख- युवा और समाज

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-आलेख
विषय-जीवन और वर्तमान चुनौतियां
शीर्षक- *युवा और समाज*
**************************
वर्तमान परिदृश्य में दौड़ती भागती जीवन ने इंसान को मशीन बना दिया है, अंग-अंग कलपुर्जों के समान प्रतीत होते हैं। सुबह से लेकर संध्याकाल तक मानव केवल भोग, लालसा,तृष्णा और मृग मरीचिकाओं की प्राप्ति में ही लगा हुआ है। जिस जीवन को प्राप्त करने के लिए इसी पावन धरा पर कभी प्रभु ने अवतार लिया था, इसकी सौंदर्यता जैसे धूमिल होने लगी है । इसी पावन धरणी पर महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी ने दो धर्मों का प्रादुर्भाव किया, विलुप्त प्रजाति और अंधत्व में सोई हुई इंसानियत का नेतृत्व किया । इसी नेतृत्व का कार्यभार युवा प्रेरणा स्त्रोत स्वामी विवेकानंद ने भी बखूबी निभाया। आज भी इनके मार्गदर्शन तम हरण करने वाले हैं।
                 सारी दुनिया एक अनदेखी अनजानी होड़ में लगी हुई है, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी लगभग युवाओं के कंधों पर ही टिकी हुई है। दुनिया को सामाजिकता सिखाने वाला, परिवार को परिवार का अस्तित्व बताने वाला, और सर्वधर्म समभाव से वसुधैव कुटुंबकम का जोत जगाने वाला यह देश "भारत" भी इससे अछूता नहीं है। 70% आबादी जहाॅं युवा शक्ति निवास करें, उनका उचित पथ प्रदर्शन करना परम आवश्यक है। युवा केवल एक परिवार का अंश नहीं होता, आगामी भविष्य के लिए ईंट से ईंट एक क्रम में रखने वाला, और अतीत के पन्नों को पलटते हुए नए कीर्तिमान स्थापित करने वाला प्रमुख अग्रगण्य पुरोधा होता है। जिसकी मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण होना परम आवश्यक है । रोटी,कपड़ा और मकान मूल आवश्यकताएं अब नहीं रही हैं। क्योंकि जहां एक रुपए किलो में चावल प्राप्त हो, इंदिरा आवास जैसे योजनाओं के माध्यम से मुफ्त में पक्के घरों का निर्माण किया जाए, उसके लिए कपड़े को आंकना निकृष्ट सोच है। इन सबके अलावा ज्यादा जरूरी भविष्य के लिए रोजगार, सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था, और पर्यावरण अनुकूल पड़ोसी मुल्कों से मित्रता का स्थापित करना ही वर्तमान मूल आवश्यकताएं हैं। युवाओं के मन में सर्वाधिक चिंतन का कारण भविष्य के प्रति अस्थिरता है। इसलिए रोजगार का सृजन परम आवश्यक है।जहाॅं बचपन से बच्चों को अच्छी नौकरी हेतु पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए वहाॅं उनके चिंतन शीलता का प्रयोग एक वैज्ञानिक सोच में यूॅं ही नहीं किया जा सकता।
                लगभग १३८ करोड़ की आबादी लिए विश्व गुरु का स्वप्न देखने वाला यह भारतभूमि युवाओं से ही निर्मित और युवाओं से ही टूटती बिखरती रही है, जिसमें नेतृत्व हमेशा से बुजुर्गों के माध्यम से हुआ है । परंतु वर्तमान में जिस तरह परिवार टूटने लगे हैं, वृद्धों की संख्या परिवार से अधिक वृद्ध आश्रमों में होने लगी है। फिर दिशा विहीन युवाओं का पथ प्रदर्शन करे कौन? ऐसे हालात में युवाओं की व्यस्तता, मनन चिंतन का उच्च स्तर, और समाज का नेतृत्व परम आवश्यक हो जाता है। क्योंकि जिन बरगद के वृक्षों ने नए टहनियाॅं दिए स्वयं से अलग नहीं कर सकते। बरगद की विशालता घनी छॉंव प्रदान करती है। परिवार की परवाह करना हमने बुजुर्गों से ही सीखा है, जिनके जीवन का कोई हाय पूनम हो उनसे कैसी प्रतिस्पर्धा? जीवन भर जो इन्होंने कमाया उसके लिए थोड़ा सम्मान और आदर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जो माता पिता उंगली थामे हर कदम पर जिस बच्चे का साथ दिया हों क्या उन्हें मरणासन्न स्थिति में जरा मुस्कुराने का हक नहीं दिया जा सकता? आज के इस युवा पीढ़ी को सूचना होगा, क्योंकि यौवन उस पानी के बुलबुले के समान है जो वक्त के झोंकों से बहता रहता है। जरा सी ताप बढ़ने पर इसका फूटना निश्चित है, फिर गुरुर और अभिमान कैसा हम भी कल वृद्ध होंगे,हमारे हाथों में भी कल लाठियॉं होंगी । हमें तय करना होगा कि रास्ता कैसा होगा अंधकार का या जगमगाते जग का....
      इसलिए इस मशीन रुपी इंसान को सामाजिकता के भाव को समझना होगा। पल-पल प्रतिपल खुशियों को तलाशना होगा । नए-नए लक्ष्य निर्धारण कर समाज को आगे लाना होगा ।समाज और युवा एक दूसरे के पर्याय हैं, दोनों एक दूसरे के महत्व को समझें जहाॅं युवा समाज के लिए नेतृत्व करें, वहीं रुढ़ियों और पीढ़ियों से जकड़ा हुआ समाज युवाओं को सहर्ष स्वीकार करे तभी भारत का स्वर्णिम भविष्य निर्मित किया जा सकता है ।
**************************
स्वरचित मौलिक रचना-
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...