जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कृषक का दर्द
विधा-कविता (मुक्त छंद)
अलंकार-विशेषोक्ति अलंकार
खेत हंसे तो सदा वो हंसता ,
खेत रोए तो वो भी है रोता।
खेतों से ही वो बातें करता,
और उपजाता चांदी- सोना ।
खेत जिनका काबा -काशी,
फसल ही है तीरथ धाम।
गाय -बैल जन्नत है जिनका,
खेत ही लगता गोकुलधाम।
खूब अन्न उपजाता फिर भी,
दो रोटी को वो सदा तरसता
सबका भूख मिटाता हर दिन,
वो धरती का भगवान कहाता।
अर्र -तता के गीत गाकर वह,
धरती के प्यास वही बुझाता ।
हर भूखे का पेट सदा भरता,
तभी अन्नदाता वो कहलाता ।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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विशेषोक्ति अलंकार-
1-और उपजाता चांदी -सोना.
2-गाय-बैल जन्नत ह जिनका।
3-धरती का भगवान कहाता।
4-धरती के प्यास वही बुझाता ।
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