Thursday, September 24, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" की रचना- प्रतिध्वनि

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय- प्रतिध्वनि
विधा- अर्थान्तरन्यास अलंकार
शीर्षक- *प्रतिध्वनि*
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दिशा दीप्त हो जीवन पथ पर दिख जाएगा ही,
अंतर्मन की प्रतिध्वनि है नग नभ से टकराएगा ही ।

अग्निपथ पर चलते जाओ राही हो तुम मंजिल के,
कश्ती बन वार सहो लहरों का पॉंव छूओ साहिल के ।।

सब धरा का धरा रहेगा तुम धरो न बात कभी,
अदम्य साहस से हो मौन मृत्यु का सौगात कभी ।

आहूत हो इस हवनकुंड के धृष्टद्युम्न का पहचान करो,
वक्त बदलेगा सूरज निकलेगा हथेली में अब जान करो ।।

उठती गिरती लहरों से आरोहण का अब सम्मान करो,
बहना है तो बहे नीर आंसुओं का न अपमान करो ।

सृजन हुआ है सृष्टि का यह रंग दिखाएगा ही,
गूॅंज रहा है अंबर जो प्रतिध्वनि तो निकलेगा ही ।

विनय प्रभाति निश दिन यही राग सुनाएगा ही,
अनल अक्षरों में मृत्यु ही शेष रह जाएगा ही ।।

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स्वरचित मौलिक रचना-
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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