रचनाकार-गोमती सिंह
जिला कोरबा छत्तीसगढ़
विधा -छंद मुक्त कविता
विषय-नदी
शीर्षक- चाहत
देख नदी को दिल ये चाहे ,
काश! मैं भी नदी बन जाऊँ ।
धरती के हर एक प्राणियों का कुछ न कुछ सहाय हो जाऊँ ।
कल कल करती उसकी मधुर भाषा सी मैं भी मधुर संगीत सुनाऊँ ।
काश ! मैं भी नदी बन जाऊँ ।
अपनी लय में मस्त रहूँ मैं सिर्फ अपनें गंतव्य को जाऊँ ।
राह में अगर कोई रोड़ा आऐ तो ,
मैं प्रचंड वेगवती बन जाऊँ ।
काश! मैं भी नदी बन जाऊँ ।
अपने सागर के दिल में समाकर मैं भी महासागर बन जाऊँ
काश! मैं भी नदी बन जाऊँ ।
बनकर नदी मैं भी वसुंधरा की सहयोगी बन जाऊँ ।
काश! मैं भी नदी बन जाऊँ
गोमती सिंह
कोरबा छत्तीसगढ़
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