*जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)*
*शीर्षक - " प्रेम के बदलते मायने "*
*विधा - छंदमुक्त कविता*
*अलंकार - उदाहरण अलंकार*
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है हिम्मत तुझमें तो एक खुद्दार बन।
मैं खुद ही हटा दुंगी, ये परदे लिबास के,
पहले मेरे आबरू का, पहरेदार तो बन।।
प्यार वो नहीं जो प्यासी हो जिस्म की।
सब्र का जो बाँध तोड़ दे,
वो मोहब्बत किस किस्म की।।
प्यार में हवस एक आग है।
ज्यों श्वेत वस्त्रों में एक दाग है।।
मुझ पर हक जताता है, सही है??
पर पहले मेरा असली हक़दार तो बन।।
प्यार कोई खेल नहीं, खुदा की एक इबादत है।
समझो तो पवित्र पूजा,
ना समझो तो सिर्फ़ एक शरारत है।।
प्यार की भावना बहुत अनमोल है।
जैसे हीरे का न कोई तोल है।।
मेरे बदन को झाँक कर देखने वाले, ऐ सुन !
मेरे सुख दुःख को अपना समझने वाला,
असली मददगार तो बन।।
रिश्तों के इस बाजार में, मुझे इस तरह ना तू तोल।
है मुझमें भी शर्म और हया,
ना समझ की, नहीं कुछ मेरा मोल।।
जिस्म है ये मेरा तेरे मुँह का पान नहीं।
जैसे चाहे तू थूक दे मैं ओ थूकदान नहीं।
मैं स्वयं ही बिक जाऊंगी इस व्यापार में,
मेरी आबरु को अपना समझने वाला,
असली साहूकार तो बन।।
मैं खुद ही हटा दुंगी, ये परदे लिबास के,
पहले मेरे आबरू का, पहरेदार तो बन।।
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*उदाहरण अलंकार का प्रयोग* :-
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1. प्यार में हवस एक आग है।
ज्यों श्वेत वस्त्रों में एक दाग है।।
2. प्यार की भावना बहुत अनमोल है।
जैसे हीरे का न कोई तोल है।।
3. जिस्म है ये मेरा तेरे मुँह का पान नहीं।
जैसे चाहे तू थूक दे मैं ओ थूकदान नहीं।।
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superb bhai
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