Monday, September 14, 2020

गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" कृत आलेख- हिन्दी

रचनाकार-गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न 
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-आलेख
दिनांक-हिंदी दिवस (14 सितंबर)
शीर्षक- *हिंदी चीर काल से*
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"हिंदी"नाम सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है जैसे संपूर्ण चराचर जगत में एक अद्वितीय पावन धरा जंबूद्वीप की पहचान हो, जो कालांतर में सिंधु से हिंदू और हिंदू से फिर हिंदी में परिणित हो गई । आगे चलकर यही हिंदुस्तान के नाम से आज भी हमारे साथ-साथ चलता-फिरता है । इक्ष्वाकु वंशी उस भरत के संतानों ने अपनी विरासती पहचान "भारत"को संभालने का सॅंवारने का या सहेजने का प्रयास तो किया परंतु शब्द "भारत" से ज्यादा "हिंदुस्तान" शब्द आज भारी लगता है ।
        इसमें वर्तमान जनमानस या अतीत के मनु वंशजों की कोई गलती नहीं है, वक्त ने अपने कालखंड के विभिन्न चरणों में यहाॅं के स्वर्णिम आभामय संस्कृति और सुख समृद्धि ने आक्रांताओं को आमंत्रित किया । इतिहास के पन्नों में कई उदाहरण परिलक्षित होते हैं जिनमें शक, कुषाण,यवन,यहूदी और मुगल प्रमुख हैं। लुटेरों की गणना असीमित हैं, परंतु इन सभी लुटेरों का सरदार बनकर एक प्रजाति ने यहाॅं लगभग 400 वर्षों तक शासन किया ,शासन ही नहीं वरन् यहाॅं की संस्कृति यहाॅं की समाज को भी तार-तार किया । और यहाॅं की समाज को यातना देकर यहाॅं की वाकपटु भाषा में अंग्रेजीयत इस तरह घोल दिया कि अब हिंदी के साथ मिलकर एक नई प्रणाली हिंग्लिश ने जन्म लिया है । इसमें हिंदी गुप्त नजर आती है । साहित्यिक धरोहरों की लूटपाट में तक्षशिला और नालंदा के भग्नावशेष व खंडहरों के नीचे दबी हुई इतिहास के पन्ने इसके गवाह हैं। कई क्षेपकों का प्रयोग कर यहाॅं की संस्कृति को बदनाम करने की दुष्कृत्व व साजिश किया गया । इसी कारण हमें उदाहरण स्वरूप कोट किया जाता है कि हिंदू सभ्यता में गाय का मांस खाना परंपरा में शामिल था। याज्ञवल्क्य संहिता,मनुस्मृति कि क्षेपक भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। वैज्ञानिक सोच से सजी हुई किताबों के पन्नों से कभी होली जलाई गई तो कभी पानी गर्म किया गया। गुलामी की बेड़ियों से जकड़ा हुआ लाचार और बेबस हिंदू समाज अपनी अस्मिता की लाज रखने में सक्षम नहीं था । व्यथित भाव से माॅं अक्षरा का कई बार अपमान हुआ। कई बार माॅं भारती के आंचल को कलंकित किया गया।
         धीरे-धीरे वक्त का पहिया चलता रहा, और आज हम एक आजाद मुल्क में आजाद विचरण करते हैं। परंतु क्या इतने वर्षों की तपस्या जो माॅं भारती ने सही है जो माॅं अक्षरा ने घुट-घुट कर बिताया है, उसका कोई औचित्य नहीं है? यह प्रश्न है आज के सुसंस्कृत और सभ्यता वान इस युवा पीढ़ी से, नव नियंता नवयुवक इस नवीन नवयुग प्रणाली से, क्या संपूर्ण राष्ट्र जिस शब्दावली, दिस देवनागरी लिपि, या जिस भाव विवेचक भाषा का प्रयोग एक दूसरे की सानिध्यता के लिए प्रयोग करता रहा है ,क्या इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा भी नहीं दिया जा सकता?यह वैसा ही प्रतीत होता है जैसा हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न का न दिया जाना ।
     महान रचनाकार पाणिनि अष्टाध्यायी लिखते समय यह कभी नहीं सोचा होगा कि कभी इस व्याकरण पर भी सवाल खड़ा किया जाएगा, या देवगण यह न सोचे होंगे कि कभी  देववाणी संस्कृत भाषा को भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। बरसों से जो इस भारत भूमि की पहचान रही है वह हिंदी भी आज ऐसे ही मौन मुद्रा में कई प्रश्न कर रही है । पाश्चात्य संस्कृति से यह सीख लेनी चाहिए कि जिस तरह चाइनीज भाषा को चीनियों ने, जापानी भाषा को जापानियों ने, और भी अन्य मुल्कों ने अपने स्वावलंबी भाषा का जैसा सत्कार किया, जिस तरह उनका अभिवादन किया जैसा सम्मान उन्हें मिला, यह एकमात्र हिंदी देश हिंदुस्तान में कपोल कल्पना ही बन कर रह गई है। एक वायरस के कारण जहाॅं संपूर्ण विश्व ग्रसित है,वहीं हिंदू समुदाय के समस्त हिंदुओं का मन मस्तिष्क भी निकृष्ट सोच रूपी कोरोना से ग्रसित प्रतीत होता है ।
      राष्ट्र की भाषा राष्ट्रभाषा तय करने का मापदंड आखिर क्या होनी चाहिए? इस पर विचार करने की आवश्यकता है और क्या किंचित मात्र भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के लिए वाद-विवाद करने की आवश्यकता है? यह आने वाली युवा पीढ़ी को तय करना होगा कि क्या यह कलंकित मनोभाव लिए वो इस देश को विश्व गुरु बनाने का जो सपना देख रहे हैं, क्या उसका सहजता से निर्वहन कर पाएंगे?
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स्वरचित मौलिक रचना_
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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