रचनाकार डॉ ओमकार साहू "मृदुल"
जिला सूरजपुर
शीर्षक- हमारी नदियाँ
विधा पञ्चचामर छंद
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*सरोजनी खिला रही, कबीर बीच धार में।*
*नदी कृपा दुलारती, उधो कृपा विचार में।।*
सुशैलजा बहे जहाँ, जलोढ़ के निशान हैं।
कछार धन से सजे, समेटता किसान है।
प्रभात द्वार खोलती,सुभान का विहान दे।
नदी बहे विभाग में,सुभेद वेद ज्ञान दे।
*सनेह नीर भाव के, सुभारती पखार में...*
*नदी कृपा दुलारती, उधो कृपा विचार में।।*
प्रवाह वेग क्रोध में, विराट रूप जो धरे।
डरावनी विनाशनी, कुभाव बाढ़ से डरे।
असंख्य को बहा चली,अकाल मौत से मरे।
विशाल द्वार तोड़ दे, प्रचंड काल जो करे।
*सहेज शैलजा सभी, नदी कहे पुकार में...*
*नदी कृपा दुलारती, उधो कृपा विचार में।।*
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