Monday, September 21, 2020

गिरधारी लाल चौहान जी की रचना- नदी

नाम-गिरधारीलालचौहान
स्थान-नवापाराखुर्द /सक्ती
जिला-जांजगीर-चाम्पा छत्तीसगढ़
विधा- कविता
विषय-नदी
मैं नदी सदियों से बहती आ रही ।
तुम्हारी की पीढ़ियों को नहला रही ।
अस्तित्व है मेरी बहुत खतरे में ।
रो रो मैं तुम सबको बतला रही ।

मैं जहां थी अब नहीं हूं ।
जो मैं पहले थी अब भी वही हूं ।
मैं फूलों की तरह खिली थी ।
धीरे धीरे अब कुम्हला रही ।

मुझ पर नजर रखो मेरी खबर रखो ।
मैं जिसमें चलती थी वह डगर रखो ।
मैं मिट न जाऊं कहीं, मैं लुट न जाऊं कहीं ।
सोच सोच बहुत ही घबरा रही ।

तुमसे मुझे स्नेह है,तुम मेरे अपने हो ।
वर्षों से जान रही तुम सब समझते हो ।
गंदगी सब डाल रहे, अतिक्रमण कर रहे ।
जल अब निर्बल नहीं,देख पछता रही ।

कारखानों से परेशान मैं लोगों के आदत से ।
मुझको मिटाने में लगे कुछ लोग ताकत से ।
ऐसी रही मिट जाएंगी,कब तक जी पाऊंगी ।
समझो ए इशारा मेरी सबको ही जगा रही ।

व्याख्या-प्रस्तुत कविता में कवि ने नदी के अस्तित्व को खतरा है,पहले की तरह जल स्वच्छ नहीं है कारखानों और लोगों की वजह से प्रदूषित होते जा रहा है अतिक्रमण के कारण लोगों को जागरूक रहने की बात किया गया है ।

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