Wednesday, September 2, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- ज्वालामुखी

रचनाकार - उर्मिला सिदार
विषय-  प्राकृतिक आपदा
विधा - कविता 
शीर्षक - ज्वालामुखी

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             *ज्वालामुखी*
फूटी ज्वालामुखी, 
धरासायी हुई धरा।
धुंध वालों की तीव्रता से,
गैस थी या धुआं।
जलती लपटती सी ज्वाला,
कम्पित मान धरा।
बाह्य पदार्थ भूगर्भ में, 
या भूगर्भ पदार्थ  बाह्य में। 
कैसे कहूं कौन बाहर,
कौन भीतर चला।
जनधन की क्षति,
पोषण धरा की राक्षसी।
पोषण है कि शोषण,
समृद्ध कहूं इसे कैसे,
झुलसी खग पशु वृक्ष,
भक्षक, कैसे कहूं रक्षक। 
प्रकृति की आपदा आई,
धरा की ही वैभव, 
हुई धरासायी।
निकली कनक,रजत,
समाई भूगर्भ में जीवन। 
श्राप है या वरदान, 
यही है प्रकृति आपदा,
और जानने को ज्ञान।
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                          उर्मिला सिदार
                          रायगढ़ (छग)
व्याख्या:- इस कविता में कवित्री प्राकृतिक आपदा ज्वालामुखी के बारे में वर्णन की है।
विशेष:- इस कविता की पंक्तियों में कहीं-कहीं संदेह अलंकार प्रयुक्त है।

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