जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विधा - छंद मुक्त कविता
विषय- प्राकृतिक आपदा
अलंकार - संदेह अलंकार
शीर्षक - प्राकृतिक आपदा
धरती पर प्राकृतिक आपदा ,
प्रतिवर्ष आते हैं ।
भारी से भारी नुकसान ,
अकस्मात कर जाते हैं ।।
उथल - पुथल हो जाता है ,
प्रलयंकारी दृश्य ।
हाहाकार करुण क्रन्दन ,
समझ न आते कृत्य ।।
ईश्वर का यह कोप है ,
अथवा भौगोलिक घटना ?
या कोई मानवीय भूल है ,
सोच - विचार करते रहना ।।
लाखों प्राणी पल भर में ,
होते काल के ग्रास ।
अविश्वसनीय अकथनीय ,
जन - धन का महाविनाश ।।
भूकम्प सूखा बाढ़ अकाल ,
सुनामी का चक्रवात ।
ज्वालामुखी भू-हिम-स्खलन ,
सब कुछ कर देते बरबाद ।।
कोरोना का संकट भी ,
प्राकृत आपदा जैसे भयंकर ।
सुरसा बनकर विश्व मानव को ,
निगल रही है अपने अंदर ।।
प्रकृति की यह कैसी परीक्षा ,
अथवा कोई प्रतिशोध ?
या पर्यावरण की नाराजगी ,
करते भीषण आक्रोश ।।
जन समाज और शासन को ,
अरबों - खरबों की हानि ।
कैसे बचें आपदाओं से जो ,
जल थल नभ की मनमानी ।।
प्रकृति का यह परिवर्तन ,
अस्तित्व का संघर्ष है ।
संकटों से लड़ना - जूझना ,
मानव का शाश्वत कर्म है ।।
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