नाम----गिरधारी लाल चौहान
स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता(वाक्यार्थोपमा, अलंकार पर आधारित)
शीर्षक - बीत जायेगी अमावस्या
बीत जायेगी अमावस्या
बीत जायेगी अमावस्या,अंधेरे का भय मत कर ।
जीवन उस जैसा न बने,इस बात से चल तू उबर ।
प्रकृति की रचना है ,उसको कौन हटायेगा ।
लेकर आता दीपावली, उसको कौन भुलायेगा ।
सारे जहां करती इंतजार, लेती रहती उसका खबर ।
क्षऐसे ही सज्जनों से, भरा हुआ है जग अपना ।
उनके आने से जीवन ,रोशन सच होता सपना ।
नहीं देखकर चलते वो ,कच्ची पक्की डगर ।
आती है अमावस्या जब, सूर्य ग्रहण होता है ।
जीवन में कभी ग्रहण न हो,दुख दुखदाई होता है ।
रहना है तुझे चौकन्ना ,ऐसे बातों पर रख नजर ।
सागर में होती ज्वार भाटा,जलो में उथल-पुथल मचता ।
जीवन में न हो कोई उथल-पुथल, इससे सब बिगड़ता ।
उथल-पुथल पूरे जीवन, दिखाता है अपना बहुत असर ।
सागर की जल की हलचल से, मोती भी बाहर आते ।
जिसको रहता उनका इंतजार,वो पाते मौज मनाते ।
ऐसे भाग्य चमकते हैं, उन्हें चमकाता है एक वही ईश्वर ।
ये अमावस्या की देन है ,किसी को धनवान बना जाता ।
अमावस्या की तरह कुछ ,उपाय करो निर्धनता मिट जाता ।
अपनी अपनी सफलता के लिए, नहीं बाकी रखना कसर ।
अमावस्या की अंधेरी रात में, जुगनू खूब चमकते हैं ।
ऐसे ही तन मन चमकदार बनाओ,सबको अच्छे लगते हैं ।
अंधेरे के बाद ही आता, जीवन में उजाले का अवसर ।
अमावस्या खुद काली होकर,जग के लिए उजली लाती है ।
दुखी होकर सुखी सबको ,देखने का यह पाठ पढ़ाती है ।
सुख दुख का पहिया हरदम ,होता रहता नीचे और ऊपर ।
जिनके पास होता गुण,सारे जग में बांटते फिरते हैं ।
रोज नहीं ये मिलते असाधारण, अमावस्या को मिलते है ।
जग में जिससे जो मिल जाए ,रहो लेने को सदा तत्पर ।
गिरधारी लाल चौहान
व्याख्या-कवि के द्वारा अमावस्या के आने पर उससे कुछ सीखने बिताने एवं वैसे ही कार्य करने का वर्णन किया गया है ।
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