रचनाकार--एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवासी-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
जिला--रायपुर ।
शीर्षक-""अमावस्या "" ।
विधा-छ्न्द-मुक्त (कविता)
अलंकार--वाक्यार्थोपमा अलंकार ।
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*******||अमावस्या ||*********
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हम सबको,सोने के लिए---
अँधियारे का,होना जरूरी है,
घोर अँधेरा,अमावस्या की रात जैसी।
अँधेरे से,नफ़रत करने वालों--
जान ले तू,इतना-सी बात,
दुःख में,सुमिरन सब करे ,
सुख आत,सब भूल जात ।
श्याम रँग,जो कोयला समाना,
अमावस्या की रात,बनी बाना,
कभी सोमवती,कभी शिवरात्रि,
तो,कभी,बनी दीपोमहोत्सव की रात्रि,
तप-तपस्या,तन्त्र--मन्त्र की हो रात्रि ।
मुफलिसी की जिन्दगी---
अक्सर बन जाती,अमावस्या-सी,
उम्मीदें तो होती बहुत,
पर,राहों में,पग बढाने में,
जैसे अड़चनें होती हैं,बहुत ।
अनाथ हो जाते,जो लोग---
किसी घटना या माँ कर दे अलग,
ईज्जत बचाने या पाप दूर करने,
पहचान पाने जैसे,लगती--- अमावस्या-सी ,जीवन की बात ।
अमावस्या भी जरूरी है---
और पूर्णिमा भी जरूरी है,
धरा के,गतिविधियों को---
चलाने,ऐसा होना जरूरी है ।
जैसे-रातरानी में खुशबू लाने,
रात का होना जरूरी है ।
कई जीव जंतुओं की खुशहाली,
अमावस्या-सी,रात-अँधेरी--
हरदिन होना जरूरी है,
वरना,भोजन मिलना होगा,
उनके लिये मुश्किल बहुत,
इसलिए,रात का अँधेरा भी,
उतना ही जरूरी है ।
आओ अमावस्या-सी रात--
और रात का घुप-अँधेरा,
होता,नींद का रैन-बसेरा ,
मिल जाएगी तन को भी,
स्फूर्ति व नई ताजगी--
इसके महत्व का करें,हम स्वागत--
और इस बात पर,सब गौर करें ।
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व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि "अमावस्या "शब्द का अर्थ के भाव से मानव जीवन के सन्दर्भ को कैसे जोड़ा जा सकता है ।
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