पता - पेंडरवानी , बालोद ,छ.ग. ।
विधा - शायरी
तू इश्क कर शायर खुदा से के तेरे शायरी में जान आ जाए ,
रब को पहचान ले कि सच्ची पहचान आ जाए ,
तू खुद की खैरियत को मत्था टेका हजारों दर पर ,
हजारों की खैर करो कि भगवान आ जाए ,
कत्ल किया तूने न जाने कितने बेगुनाहों की ,
कुछ ऐसा कर कि तेरी बेगुनाही पर ईमान आ जाए ,
जीने व मरने के बीच टिकी है जिंदगी तेरी ,
इस क़दर जियो कि अपनो में सारा जहां आ जाए ,
हर गली में , कूचों में, गरीबी में रब है बेसहारा ,
किसी बेसहारे को सहारा दो कि गैरों को अभिमान आ जाए ,
मुकद्दर तेरा, तू खुद ही बदल सकता है अपने हाथों से ,
इन लकीरों को छोड़ो तो मुट्ठी में जहान आ जाए ,
रंग भी गया , रूप भी वो तमाशे भी जवानी के ,
घर उतना ही बना कि बुढापे का सामान आ जाए ,
क्यूं? जवानी में बुढापे का चलन लाते हो शायर ,
ठहाकों से भर दो महफ़िल कि मुर्दो में जान आ जाए ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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