जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-मेरा हिंदुस्तान
विधा- पद्य शैली
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स्वतंत्रता के रज कण-कण में,
बहा बूॅंद-बूॅंद रक्त बलिदान है...
धन्य-धन्य धरा धन्य माॅं भारती,
धन्य सृष्टि धन्य सारा जहान है...
नवयुवक नवयुग के निर्माण में,
नवजीवन सहर्ष त्याग दिया था ।
सुखचैन सब अपना छोड़कर,
अभाव में भी निज को प्रयाग किया था ।।
त्याग तप से नवयौवन महान है...
स्वतंत्रता के रज कण-कण में,
बहा बूॅंद-बूॅंद रक्त बलिदान है...(१)
स्वतंत्रता की मशाल यूॅं ही न जली थी,
चीख चीत्कार उनकी आंधियों में भी पली थी ।
वन-वन पथरीली राह चुनना,
प्रताप से पूछो पग पग में मृत्यु सम्हली थी ।।
मॅं भारती के भाल प्रताप सुशोभित सम्मान है...
स्वतंत्रता के रज कण-कण में,
बहा बूॅंद-बूॅंद रक्त बलिदान है...(२)
भगत,आजाद और बोस सदृश,
कितने दीप वतन के दीपदान हुए ।
महका-महका सुवासित चमन आज,
काॅंटों से भी गूंथे हुए गुल-ए- गुलिस्तान हुए ।।
जैसे दामन आजादी का लहूलुहान है..
स्वतंत्रता के रज कण-कण में,
बहा बूॅंद-बूॅंद रक्त बलिदान है...(३)
जिंदगी जीवित जिंदादिली है,
वतन परस्ती बिना सब श्मशान है...
आजाद हैं हम इस आजा़द मुल्क में,
आन-बान-शान मेरा हिंदुस्तान है...
स्वतंत्रता के रज कण-कण में,
बहा बूॅंद-बूॅंद रक्त बलिदान है...(४)
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स्वरचित मौलिक रचना-
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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