संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ.ग.)
विषय :- *बुनकरों की व्यथा*
(वाक्यार्थोपमा अलंकार का प्रयोग)
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~ •°• *बुनकर की व्यथा* •°• ~
आजादी के पहले
और बाद की कथा,
जिसमें छुपी हो ज्यौं
बुनकरों की शुतुरमुर्गी व्यथा।
कहाँ सीखी थी सुंदर
शिल्प और कलाकारी,
ज्यौं कैनवास में
चित्रकार करता चित्रकारी।
कपड़ों के एक-एक
बिम्बों में अक्षर सा दिखे,
जैसे गीतकार ने लिख
दी हो कविता न्यारी।
खट-खट, खटर-खटर
हथकरघे की आवाज,
लगता जैसे कोई गा
रही हो संगीत प्यारी।
बुनकरों की बारिकियाँ
मकड़जाल जैसी,
ज्यौं चक्रव्यूह में
फँसी जिंदगी सारी।
रेशे-रेशे में छिपी इनकी
वेदना और मुफलिसी,
हाथों और उँगलियों की
कसक में जिंदगी ख्वारी।
*वाक्यार्थोपमा अलंकार का प्रयोग*-
1.ज्यौं बुनकरों की शुतुरमुर्गी
व्यथा।
2.ज्यौं कैनवास में चित्रकार
करता चित्रकारी।
जैसे गीतकार ने लिख दी
हो कविता न्यारी।
3.गा रही हो जैसे संगीत प्यारी
ज्यौं चक्रव्यूह में फँसी जिंदगी
सारी।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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