संबलपुर, जिला -कांकेर,(छ.ग.)
विधा-आलेख
विषय-हिंदी है हम
*हिंदी है हम*
भाषा भाव और विचारों के संवाहक होती है ।भाषा का स्वरूप निरंतर बदलता रहता है।
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम के साथ-साथ समाज के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक पहलूओं का परिचायक भी है।
हिंदी का जन्म संस्कृत भाषा से हुआ है, और यही काल के अनुसार पाली,प्राकृत के बाद शौरसेनी अपभ्रंश के रूप को प्राप्त कर हिंदी के वर्तमान रूप को प्राप्त किया है ।दिल्ली ,मेरठ के आसपास बोली जाने वाली बोली को 1949 में राजभाषा का दर्जा मिला था । हिंदी का उद्गम 10 वीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ। हिंदी ,उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा ,मध्य प्रदेश ,राजस्थान, छत्तीसगढ़ ,में बोली जाने वाली भाषा है ।दुनियाँ में लगभग 600 मिलियन लोग हिंदी भाषा को पहली या दूसरी भाषा के रूप में स्वीकार करते हैं ।हम आज जो हिंदी बोलते हैं वह ब्रज,अवधी, से परिवर्तित होकर हिंदी के वर्तमान रूप को प्राप्त की हुई है। इस बीच कई संस्कृतियों का भी जन्म हुआ जिसके कारण उर्दू ,अरबी ,और फारसी का स्पष्ट प्रभाव हमारी भाषा के ऊपर दिखाई देता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 राज भाषा अधिनियम 1963(संशोधित1967)के अनुसार आठवीं अनुसूची में बीस भाषाओं की सूची है।
स्वतन्त्रता के पश्चात भले ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है ।लेकिन भाषा के प्रचार प्रसार के लिए सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता ही चला गया। वैसे हिंदी की वैश्विक स्थिति बेहतर है। विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा में अध्यापन एवं शोध कार्य हो रहे हैं ।स्वतंत्रता प्राप्ति के 73 वर्ष बाद भी यह दयनीय स्थिति नहीं है क्या ?यह शर्मनाक भी है पर क्या हम शर्मिंदा हो रहे या बेशर्म हो गए हैं? इसका जवाब ढूंढिये कहीं ना कहीं हमारी अपनी कमियाँ आँखें फाड़कर हमारे पास ताकती मिलेगी ।जब गलतियों को सुधार कर खुद सुधरेंगे तब कहीं देश की भाषा सुधारने की काबिलियत आएगी ।
हम अंग्रेजी की अवहेलना कर हिंदी को आगे बढ़ाएं जहाँ अंग्रेजी हिंदी के स्थान नहीं ले सकती ,वहाँ निश्चित रूप से हिंदी भी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले सकती। देवनागरी लिपि भाषा को सहज और सौम्य बनाती है।यह उच्चारण दोष से रहित वैज्ञानिक भाषा है ।हिंदी सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने वाली है ।तभी मैक्स मूलर को संस्कृत भाषा से प्यार हो गया था। आज हिंदी भाषा पर पाश्चात्य संस्कृति हावी हो गई है ।हर पालक अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना शान समझता है ।अपने घर में हिंदी की इतनी दुर्दशा.... बात-बात पर भारतीय संस्कृति को भूल गुड- बॉय, गुड मॉर्निंग ,गुड नाइट कहना शान समझी जाती है। भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए हिंदी भाषा तरस रही है।
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में राज भाषा के रूप पारित हिंदी 14 सितबंर 1953 से हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है।विभिन्न आयोजनों के द्वारा हिंदी को प्रचारित एवं प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जा रहा है,लेकिन राष्ट्र भाषा के रूप में स्थापित होने के आसार नहीं दिखाई दे रहे है।हम रस्मी तौर पर हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा, हिंदी महीना मना लेते है।शासकीय स्तर पर होने वाले आयोजनों में लाखों करोड़ों खर्च भी करते है।लेकिन आयोजनों के मंच से उतरने के बाद फिर अंग्रेजी के आसन्दी पर बैठ जाते है।
आज हिंदी का कद बढ़ते नजर आ रहा है।यह एक सुखद पहलू है।आज हिंदी भारत के मानचित्र से बाहर आकर विश्व के विराट फलक पर अपना वर्चस्व स्थापित करती नजर आ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस वर्षों में-
1.हिंदी भाषी *दस करोड़* बढ़े।
2.पाँच वर्ष में दक्षिण भारत में हिंदी सीखने वाले 22% बढ़े।
3.हिंदी शब्द कोष बीस हजार से बढ़कर डेढ़ लाख हो गए।
4.इंटरनेट से हिंदी सीखने वाले 94%के दर से बढ़ रहे है।
5.68%लोगों ने हिंदी पर भरोसा दिखाया है।
वर्तमान सरकार ने नई शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा भाषा या क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाने पर जोर देते हैं।यह स्वागत योग्य है। उम्मीद नकी एक नई किरण नजर आ रही है कि नई शिक्षा नीति हमारी अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी।इससे देश की मातृभाषा को अपेक्षित सम्मान भी मिलेगा।संभवतः राज भाषा की पदवी को हटाकर राष्ट्र भाषा का दर्जा भी प्राप्त कर लेगी।
हम"विश्व बंधुत्व " और 'वसुधैव कुटुंबकम' की बात करते हैं ।यातायात और टेक्नोलॉजी विज्ञान के साथ संचार सुविधाओं ने विश्व में हलचल मचा दिया है। भाषा ,संस्कृति, संस्कार, परंपराओं की संवाहिका होती है। अतः इनकी रक्षा के लिए मातृभाषा ,राष्ट्रभाषा ,के साथ क्षेत्रीय भाषा का भी प्रचार प्रसार करना चाहिए मातृभाषा हिंदी के सवर्धन के लिए हम कदम बढ़ाएं और हिंदी को विश्व पटल पर पल्लवित और पुष्पित होते देखें।
नलिनी बाजपेयी
सम्बलपुर, कांकेर, (छ .ग.)
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