Tuesday, September 15, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" की रचना- बुनकर

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- वाक्यार्थोपमा अलंकार
विषय-बुनकरों की व्यथा
शीर्षक- "बुनकर"
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उदयाचल में अब वह दिनकर नहीं निकलता है,
जैसे बुनकर कोई पग-पग डर-डर पथ में चलता है ।
माॅं भारती को परिधान और श्रृंगार दिया था जिसने,
व्यथित भाव से कारीगर वही गिरता उठता संभलता है ।।

कम निवेश पर अधिक लाभ दिलाया जिसने,
मलमल मखमल का कालीन बिछाया जिसने ।
पावरलूम से हाथों की कारीगरी सिमट गई ।
जैसे दूर समंदर में कोई सरिता सिमट गई ।।

खादी पहने नेताजी चाय समोसा वाली जगह बताया करते हैं,
लाख दलीलों को बुनकर यूॅं ही सुलझाया करते हैं।
विडंबना है कि सरकारी हस्तक्षेप में भी,
ईआईएचबी एक मंच जिसमें बुनकर नियम बनाया करते हैं ।।

आज सीधा संवाद था न कोई विवाद था,
सरकार के पक्ष पर सरकार का प्रतिवाद था ।
चरखा चलाना सिखाया था बापू ने,
यकीन नहीं होता उस पर कभी संवाद था ।।

हमें खादी और चंदेरी का संघर्ष जानना होगा,
नोटों के मोल बिकने वालों तुम्हें खादी को पहचानना होगा ।
सूरत-मालवा की पठारें निर्वस्त्र हो जाएंगी,
वही सूत कपास मलमल इन्हें फिर से पहनाना होगा ।।

बुनकरों की दशा देख पुच्छल तारा कोई टूट गया होगा,
गांधी का चरखा वह चलने को जैसे रूठ गया होगा ।
रूठ गए हैं बुनकर इनको मनाना होगा,
रोजगार सृजक हैं बुनकर इन्हें निश्चय अपनाना होगा ।।

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स्वरचित मौलिक रचना
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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