निवासी-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक-""सुनामी """ ।
विधा- - -कविता ।
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●●|||>>•सुनामी ••<<|||●●
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सागर की लहरें---
उठती हैं,जब जोश में,
कहर बरपा देती तटीय इलाकों में,
बन जाता,एक तूफ़ानी चक्रवात ।
वो कहलाता है---
विज्ञान की भाषा में,"सुनामी "
कर देता है,सबकुछ वो बरबाद ।
ऐसी ही प्रकृतिक घटना हुई थी,
दि.29अक्तूबर,1999 को,
उड़ीसा राज्य में --
बंगाल खाड़ी से आया था ।
वहाँ था,उस पल,मौत का तान्डव,
और इस समय,जगह -जगह में,
थी,दीपावली उत्सव का माण्ड्व ।
उधर जल रही थी चितायें ,
और देश में,फूट रहे थे पटाखें ।
रोते-बिलखते रहे,वहाँ कई परिवार,
और हो छायी थीं,अनार-फुलझड़ियों की रोशनी व खुश थे परिवार ।
काल बन,काल रात्रि,बनी डायन,
मौत के घाट उतार दिया गया,
जैसे काली बन,रणचंडिनी रुपेन ।
मैं सागर की लहरें,
करती हूँ,अपने आप से बातें,
दोष मेरा,कदापि नहीं है,
ये मौसम,तूफानों का है ।
गर तुम नादा इंसान--
विज्ञान की चरम सीमा में जाओगे,
कहीं ढेरों खुशियां तो,
कहीं पर,ढेरों गमी का सैलाब पाओगे।
वो सोचता है,मन ही मन में---
करेगा कोई और है,
पर,नाहक बदनाम मुझे कर जाओगे ।
प्रकृति की अदृश्य शक्ति व मार को,
तुम नादा,क्या इतना समझ पाओगे ।
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व्याख्या--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जाति प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते जा रहा है,इसी कारण प्रकृतिक आपदाएं हमारे समक्ष प्रगट हो रही हैं ।
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