स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (संदेह अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"प्राकृतिक आपदा -:"बाढ़"
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चहुँ ओर दिखा जलाशय
धरातल लगे या जलथल है
नौका बनकर उफलने लगा
मच्छ या फिर कोई तन है
मेरे नयन होने लगे निःशक्त
या मौसमी धुंध का फेर है
फिर भी बादल बरस रहे
कौन जाने ये कैसा कहर है
देखा बहुत है बाढ़ का मंज़र
प्रलय या फिर कुछ और है
कब थमेगा यह जलजला
पुष्पा के दोनों नयन नम हैं।
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