Wednesday, September 30, 2020

द्रोपती साहू "सरसिज" की रचना- ठेकेदार

द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक ;"ठेकेदार समाज के"
विधा-कविता(तुकांत)
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उपकार पर आभार जताना, 
अपनी शान के खिलाफ मानते हैं।
कुछ न करके भी दूसरों के,
किये का श्रेय लेना जानते हैं।।

अनपढ़ों की क्या बात,"सरसिज"
बुद्धिजीवी लोग भी कहाँ मानते हैं।
ग़ुर सच को झूठ में बदलने का,
काले झूठ को सफेद करके मानते हैं।।

बात नेकी की करते थकते नहीं,
दिखावा हमदर्द बताकर सम्भालते हैं।
मीठे ज़हर का कड़वा घूँट पिलाना,
मसीहा रहनुमाई को लोग पहचानते हैं।।

संगमरमर पे चढ़ाएँ मैली चादरें,
दाग़दार करने के तरीक़े तानते हैं।
कालिख़ ख़ुद के मन की छुपाकर,
लबादा मसीही ओढ़ना सब जानते हैं।।

जयकारा शब्द सुनने अपने लिए,
कान अपने अपने सब संवारते हैं।
करके ढेर पर ढेर हर बुराईयों को,
समाज के ठेकेदार बनना ठानते हैं।।
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