रचनाकार- अजय पटनायक
स्थान- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विषय- आंगन*
विधा- मनहरण घनाक्षरी
*आंगन*
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आंगन के माटी कहे,सुख-दुख साथ रहे।
जीवन के ऊंच-नीच, सबको बताते हैं।।
खेलते हैं किलकारी,सजते हैं फुलवारी।
पीढ़ियों की गाथा हां जी,सबको सुनाते हैं ।।
संग परिवार रहे, रार और प्यार रहे।
आंगना तो पास में जी,सबको बुलाते हैं।।
शादी की हो शहनाई,अर्थी की हो दुखदाई ।
हंसते हंसाते फिर,सबको रुलाते है।।
कमरे में बोझ लगे,खुली हवा खोज लगे।
सुंदर सा आंगन है,सबको रिझाते हैं।।
दूर जब घर से हो,भीड़ से शहर में हों।
घर के ही आंगन जी,याद हमे आते है।।
तुलसी चँवर हो या,धूमती भंवर हो जी।
आंगन विहग बैठे, हमको सुहाते है।।
उत्सव की बात हो या,जागराता रात हो जी।
सजधज आंगन ही,हमको तो भाते है।।
छोड़ नही जाना कभी,लौट कर आना सभी।
पुरखो की यादें सभी,इसमें समाते है।।
दादी की कहानी भी है,नानी की जुबानी भी है।
आंगन में प्रेम की हाँ, गंगा भी बहाते हैं।।
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