पता :- तमनार ,रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
वर्तमान पता :- सम्बलपुर ओड़िशा
विधा :- कविता (मुक्त छंद )
शीर्षक :- हाय रे कोरोना
हाय रे कोरोना तूने क्या कर डाला ,पेट से भूख छीनी मुख से
निवाला |
अपनों से दूर करके ,इतना मजबूर करके बत्तर किया है गुजारा |
स्वच्छंद मनुज बंदी बना , सबको
छूना हो गया मना |
आया कहाँ से तू चीन का जना ,हाथ तेरा कितनो के खून से सना |
जा अपनी माँ के पास कर भाइयों का मुँह काला |
हाय रे कोरोना तूने क्या कर डाला , पेट से भूख छीनी मुँह से निवाला |
लोगों से काम छूटे ,भक्तों से भगवान रूठे |
बच्चों से पढ़ाई छूटी , लोगों की
आस टूटी |
मच गई त्राहि -त्राहि जैसे किस्मत
हो फूटी |
पड़ रही सब पे भारी जीवन की कसौटी |
सस्ता खून हो गया महँगी है रोटी |
दिन कटते नहीं है रातें लग रही छोटी |
अमीर आराम में हैं निकल
रहा गरीबों का दिवाला |
हाय रे कोरोना तूने क्या कर डाला , पेट से भूख छीनी मुख से निवाला |
बिन काम बिन पैसा ,महंगाई बढ़ी बेतहासा |
कीड़े ,बाढ़ और चीन का सहा हमने तमाशा |
सबल खड़े हैं घेरा नहीं है
निराशा |
भले दूर हों सबसे पर दिलों में
दुरी नहीं है जरा सा |
बंद करके रहेंगे तेरे लिए अपने पट का ताला |
भारत के महारथी हम ,न समझ चीन का चाउमीन वाला |
जा रे जा कोरोना अब तेरा यहाँ दाल नहीं गलने वाला |
हाय रे कोरोना तूने क्या कर
डाला ,पेट से भूख छीनी मुँह से निवाला |
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