स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (विशेषोक्ति अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"धरती तनय"
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सींच-सींच धरती हरी करें
संसार भलाई जानकर
बसुंधरा को मां कहे
खुद को तनय मानकर ।
तपती धूप न शीत लगे
ना भिगाये जल की फुहार
हाथ हल लेकर निकले
अपने कर्म को सदा तैयार ।
कोठार परे मीसे भरे
दिन दोपहरी चाकरी करें
हाय रे हलधर संगी तुझे
अन्न से ही मोहताज करें ।
जलधि बराबर अन्नागार
मंडी में नपाए सरकार
अन्न भरने वाले को ही
भूख की पड़ती मार ।
सब कुछ अपना झोंक कर
पेट भरे पूरा संसार
जब उसका निवाला छिन जाए
तो हम सब को है धिक्कार ।
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