स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त ,विशेषोक्ति अलंकार
शीर्षक- कृषक का जीवन
आनंदित होता वह कृषक
लहलहाते फसल को देख
अपनी कड़ी मेहनत का साथी
बैंलों को निहारता प्रेम से ।
चिलचिलाती धूप हो या
कँपकँपाती ठंडी, या हो
मूसलाधार वर्षा, श्रम
लगातार वह करता ।
भरपूर अनाज उपजाता
उत्साहित सदा वह रहता
अपनी मेहनत का फल.
पाकर गीत खुशी के गाता ।
इतनी पूंजी होकर भी,दो
वक्त की रोटी को तरसता
भौतिक सुविधाओं से दूर
सादा जीवन वह बिताता ।।
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