जिला :- महासमुन्द
विषय :- भय ग्रस्त मन
शीर्षक :- भय ग्रस्त मन
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- अतिशयोक्ति अलंकार
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है भय ग्रस्त मन,
उस पर बढ़ता हृदय स्पंदन।
ज्यों छाई घनेरी काली रात,
और चहुँ ओर घिरा निर्जन वन।
भय इस बात का कि,
कहीं आ न जाए दानव विकराल।
कंद - मूल सा निगल ले मुझको,
बनकर वह मेरा काल।
देख कर उसकी विशाल काया,
भय से कंपित है तन - मन।
उस पर काटने को दौड़े है,
वन में मेरा अकेलापन।
अचानक झपटती,
एक खग विकराल।
स्वेद से तर होकर,
मैं हुआ बेहाल।
ज्यों बढ़ा आगे किसी तरह,
खुद को यूँ ही बचते - बचाते।
देखा मैने लोगों को तब,
धधकते हुए आग मे समाते।
भय की दुनिया से निकलने का,
दिखता नहीं यहाँ कोई जरिया।
एक ओर भयानक दानव,
एक ओर बहती आग का दरिया।
टूटा सपना जागा जोगी,
थम गया जरा सा हृदय स्पंदन ।
वापस आया वास्तविकता में,
पुलकित हो उठा भय ग्रस्त मन।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने अपने एक भयानक सपने का जिक्र किया है जिसमें एक तरफ विकराल दानव और पक्षी है तो दूसरी ओर आग का दरिया। यह सब देख वह भयभीत हो उठा है। लेकिन तभी निद्रा भंग हो जाती है और वह वास्तविक दुनिया में आ जाता है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
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