जिला - बलौदा बाजार(छ. ग.)
विषय - भय ग्रस्त मन
विधा - छंद मुक्त कविता
( अतिशयोक्ति अलंकार )
शीर्षक - भय का भूत
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// भय का भूत //
भय का भूत भगाओ मन से ,
भयभीत होना कायरता है ।
निर्भयता का पाठ पढ़ो ,
जीवन की आवश्यकता है ।।
भय से सारे काम बिगड़ते ,
मन कमजोर हो जाता है ।
कई प्रकार की आशंकायें ,
दीमक बनकर आता है ।।
भय से दुःख और चिंता होते ,
भविष्य में क्या होगा ?
आधि - व्याधि करे आक्रमण ,
तन - मन देते धोखा ।।
विद्यार्थी को परीक्षा का डर ,
नौकर को मालिक का ।
खाना बिगड़ने का गृहिणी को ,
अपराधी को पुलिस का ।।
हट्टे - कट्टे मोटे आदमी ,
चुहिया से डर जाता है ।
मन के अन्दर छिपा हुआ भय ,
अकस्मात चिल्लाता है ।।
डरते - डरते बोतल में ,
डाली जाये दूध - घी ।
निश्चित ही गड़बड़ होगा ,
हो जायेगी खाना खराबी ।।
सब जीवों में स्वाभाविक होते ,
आहार निद्रा भय मैथुन ।
लेकिन खतरनाक हानिकर ,
होते भय का ये विशेष गुण ।।
सुरक्षा और मर्यादा हेतु ,
भय भी जरा जरूरी है ।
ज्यादा डरते - डरते रहकर ,
जीना भी क्या मजबूरी है ??
देश काल स्थिति अनुसार ,
भय के नाना रूप ।
जो डर गया सो मर गया ,
गिरते खाई - कूप ।।
भय ग्रस्त मन पाप है ,
मृत्यु और गुलामी ।
भय से मानव के जीवन मे ,
आते हिंसक सुनामी ।।
धैर्य पराक्रम हिम्मत शौर्य ,
संकल्प आत्मविश्वास ।
सभी पुष्ट - पोषण करते हैं ,
निर्भयता का निर्भय नाद ।।
अजर - अमर आत्मा अविनाशी ,
अपने को जानो - पहचानो ।
मन का भय निकल जायेगा ,
स्वयं को तुच्छ कभी मत मानो ।।
भय मुक्त हो घर - परिवार ,
दुनिया देश समाज ।
कोरोना का भय मिट जाये ,
सभी लोग चाहते हैं आज ।।
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