रायगढ़,-छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद कविता
विषय-भावी सुबह ( अन्योक्ति अलंकार)
शीर्षक-चुनाव
चाहे जाएं हजारों जान
सरकार का केवल एक ही ध्यान
कैसे हमदर्दी का खेल खेला जाए
येन केन प्रकारेण सत्ता बनाया जाए
आम जनता देश की अर्थव्यवस्था की मारी
सिने जगत पर एन सी बी है भारी
उस पर ये जानलेवा महामारी
सरकार है ना तुम्हारी, ना हमारी
चुनावी दंगल के हैं खिलाड़ी
सुशांत को न्याय के नाम पे
चुनाव जीतने की है तैयारी
लाशो के ढ़ेर पे बैठी जनता बेचारी
भावी सुबह काली होगी या सुनहरी
थाली में रोटी होगी तेरी या मेरी
या थाली की छेद पर संसद में बवाल होगी
भावी सुबह फिर कीचड़ ही उछाली जाएगी।
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