रचनाकार -सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक _भोर का सूरज
भोर का सूरज अपने साथ नई रौशनी लाता है |
खुद जागकर कर हमें जगाने आता है |
उम्मीदों कोसाथ लिए फिर चल ये सिखलाता है |
कर्तव्य पथ पर बढ़ो तो वो हमें समझाता है |
दिन निकला अब करम करो अपना अपना धर्म करो |
अच्छी बातो को अमल मे लाओ अपना जीवन धन्य करो |
सूरज निकलते जीवन भी चल पड़ता है |
शाम ढले जीवन भी थम जाता है |
आकर सुबह सबेरे फूलो को खिलाता है |
उसकी रौशनी मे फिर पत्तों पर ओस नहाता है |
चिड़िया भी स्वागत मे रवि के गीत गाती है |
पूरी प्रकृति भी फिर झूम उठती है |
जिसको नमन धरती कर फूलो की क्यारी सजाती है |
मोर खुश हो जाता है कोयल कु कु करती है |
गृहणियां भी द्वार पर रांगोळी बनाती है |
सूरज की पहली रौशनी उस पर भी पड़ जाती है |
झरने कल कल करते है नदिया भी गुनगुनाती है |
फिर जीवन चल पड़ती है और मुस्कुराती है |
सूरज आते ही चल पड़ता है करवा जीवन का,
यही सत्य है इस के जीवन चक्र का |
भोर का सूरज रोज आकर खुशियाँ दे जाता है |
नवजीवन के संचार कर जीना हमें सीखता है |
भोर का सूरज अपने साथ नई रौशनी लाता है |
खुद जागकर हमें जगाने आता है |
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
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