रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-छंद मुक्त काव्य ( वाक्यार्थोपमा अलंकार)
विषय-बुनकर की व्यथा
शीर्षक-मशीनीकरण
औद्योगिकरण और मशीनीकरण
के युग मे जाने कितने बर्बाद हुए
जैसे हाथ कट गए,चूल्हे रुठ गए
स्वरोजगार के साधन सारे बंद हुए
फ़ैशन परस्ती के पीछे ही आज
ज्यों सारी दुनिया बावली हो रही
सूती छोड़ मलमल को अपना रही
रेडीमेड कपड़े ही सबको भा रही
हथकरघों,बुनकरों की व्यथा,दुर्दशा
कोई ना समझे उनकी अनकही कथा
मशीनीकरण में ज्यों मनुष्य का हृदय
का भी मशीनीकरण हो मानवता मिट गया
बुनकरों के वस्त्र ने ही प्राणिजगत में
मनुष्य की लाज बचा उसे भिन्न बनाया
कल तक जो स्वेद बहा गर्वित था निज कर्म पे
आज हालात पे अपने ज्यों आँसू बहाने को मजबूर है।
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