जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग. )
विषय - प्रतिध्वनि
विधा - छंद मुक्त कविता
( अर्थान्तरन्यास अलंकार )
शीर्षक - विधि का विधान
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// विधि का विधान //
रहन - सहन और खान - पान ,
कुल - परिवार समाज ।
जैसी जिसकी संगति ,
वैसा जीवन काज ।।
देश काल और परिस्थिति ,
आदत - व्यवहार बनाते ।
भेड़ों के बीच पला मानव-शिशु ,
ज्यों चौपाया बन मिमियाते ।।
आतंकवादी डाकू चोर ,
शराबी और जुआरी ।
क्या इनके संग में रहने वाले ,
होंगे सज्जन सदाचारी ??
संतों का संग करने वाले ,
स्वयं संत बन जाते हैं ।
जैसे गंगा में मिलकर अनेक नाले ,
गंगा जल बन जाते हैं ।।
जैसे पानी दूध के संग ,
ऊँची कीमत पाता है ।
अच्छी संगति पाकर मानव ,
वैसा ही बन जाता है ।।
सुख से सुख और दुःख से दुःख ,
गाली से गाली मिले ।
ध्वनि अनुसार प्रतिध्वनि ,
ताली से ताली मिले ।।
जो भी देंगे त्याग करेंगे ,
वापस वही आयेगा ।
देना देना देना सीखो ,
संग्रह से पछतायेगा ।।
प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया ,
सृष्टि का सिद्धांत है ।
बिम्ब का जैसे प्रतिबिम्ब ,
संग का रंग सुनिश्चित है ।।
प्रकृति के इस नियम से ,
क्यों मानव मुख मोड़ा है ?
खालीपन की जिंदगी में ,
अपने लिये ही जोड़ा है ।।
अच्छाई का फल अच्छा है ,
बुराई का फल बुरा ।
जैसी करनी वैसी भरनी ,
विधि का विधान पूरे का पूरा ।।
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अलंकार प्रयोग -
1- भेड़ों के बीच......
2- जैसे गंगा में ......
3- जैसे पानी दूध के .......
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