*जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)*
*शीर्षक - " बाढ़ का कहर* "
*विधा - छंदमुक्त कविता*
*अलंकार - संदेह अलंकार*
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जल में थल है कि,
थल में जल है।
भू-खण्ड बना टापू,
प्राकृतिक आपदा का बल है।।
जलमग्न हुआ सारा गाँव,
चारों तरफ पानी ही पानी है।
आवागमन हुआ बंद सभी का,
लाचार खुद को सबने मानी है।।
पुल बने ऊँचे-ऊँचे,
दूरियाँ-नजदीकियाँ बढ़ाते हैं।
जल का रास्ता है या,
ओ जिसमें हम आते-जाते हैं।।
गरीब किसान के फसले नष्ट,
धड़कन उनकी थम गयी है।
बर्षा कहलाती जीवनदायिनी,
फिर प्राणघातक क्यों बन गयी है।।
तैरता दिखा दूर में ओ कैसा,
मानव या कोई जानवर है।
मदद की जो गुहार लगाता,
नेटवर्क का नहीं टाॅवर है।।
हजारों लोगों की जान गई,
ऐसा कहर बरपाया है।
चीखती चिल्लाते खतरों के बीच,
किसी ने खाना तक नहीं खाया है।।
क्या दोष उस नन्हीं बच्ची का अब,
बाढ़ ने जिसे बहायी है।
बोल भी न पाती थी ओ नादान,
आज रोते-रोते रात बितायी है।।
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*संदेह अलंकार का प्रयोग* :-
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1. जल में थल है कि,
थल में जल है।
2. जल का रास्ता है या,
ओ जिसमें हम आते-जाते हैं।
3. तैरता दिखा दूर में ओ कैसा,
मानव या कोई जानवर है।
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