जिला:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- पितर पाख (पितृ पक्ष)
विधा:- कविता
पितर पाख (पितृ पक्ष)
कइसन पितर पाख ग संगी,
जम्मो झन मनावत हे।
जियत मनखे ल छोड़ के,
कँऊवा कुकुर ल खवावत हे।।
तरोई पान अऊ काँशी के कुश,
गँहू जवाँ संग जोहारत हे।
जियत भर पानी नई देइच,
मरे ऊप्पर ले गोहारत हे।।
भरम तुमन ल अतका हवै,
मरे ऊपर ले पानी पाथे।
आड़ इँखर लेके ग संगी,
चीला बरा मन भर के खाथे।।
मरे ऊपर ले तोर हाथ ले बेटा,
पानी कहाँ ले पाहूँ मैं।
जियत म तैं छाती जुड़वा दे,
मन भर के मर जाहूँ मैं
जऊन करना हे जियत म करले,
मरे ऊपर ले तैं का करबे।
उम्मर भर के करम ल भइया,
पितर पाख म का धो डरबे।।
रुढ़ीवादी अऊ परंपरा ले हटके,
विचार मन म अपन करौ।
अगोरा छोड़ पितर पाख के संगी,
दाई ददा के जतन करौ।।
नागेश कश्यप।
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