Tuesday, September 1, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- वनांचल में शिक्षा

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " वनांचल में शिक्षा का महत्व "
     विधा - छंदमुक्त कविता 
अलंकार - उत्प्रेक्षा अलंकार 
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सरल सरस ये वनवासी, 
प्रकृति प्रेम इनका अटूट है। 
वनों के रक्षक, भोले-भाले, 
चिपको आंदोलन के अग्रदूत हैं। 

पर्वत पहाड़ नदी नाले, 
मानों इनके मनमीत हैं। 
झर-झर करता ज्यों ये झरना,
इनकी बोली मधुर संगीत हैं।

आधुनिकता नहीं यहाँ जरूर, 
विकास से कोसों है दूर, 
फिर भी प्रतिभा की कमी नहीं,
मानों मांझी सा इनमें नूर।।

शिक्षा की व्यवस्था हो अच्छे, 
वनांचल का भी नाम हो।
ज्यों चमके सूरज-तारे,
अवसरों का खुला आसमान हो।। 

शिक्षा की नई ज्योति जलाने, 
सरकार को कदम उठाना होगा।
विकास की पहिया को चलाने, 
निश्चय ही आगे आना होगा।। 

स्कूलों का नवनिर्माण हो, 
शिक्षा सबके द्वार हो। 
अपने अधिकार से परिचित हो सब, 
मन में नवीन विचारों का संचार हो।। 

ज्यों वीर नारायण ने इतिहास रचा, 
इतिहास ये भी दोहरायेंगे।
वर्तमान के पन्नों पर ये वनवासी, 
सफलता का परचम लहरायेंगे।।

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उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग :-
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1. झर-झर करता ज्यों ये झरना। 
2. मानों मांझी सा इनमें नूर। 
3. ज्यों चमके सूरज तारे। 
4. निश्चय ही आगे आना होगा। 
5. ज्यों वीर नारायण ने इतिहास रचा।
                                           
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