जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- मरी हुई संवेदनाएँ
विधा- मुक्त काव्य
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हर रोज घटित हो रही हैं
वीभत्स घटनाएँ बेटियों के साथ
नोच रहे है रोज गिद्द और चील बनकर
कभी यहाँ तो कभी वहाँ
मानव के वेश में लिपटे दरिंदे
और उसको पंख देती,
जाति और सम्प्रदाय में बंटी समाज
जो चीथड़े से ढंकी क्षत विक्षत मास के लोथड़े में भी
पहले ढूंढती है जाति,
जिन दरिंदों को पशु भी अपने वर्ग में न रखे
उसमें भी पहले ढूंढते है जाति और वर्ग
फिर दिखाते है अपनी आक्रोश और संवेदना
पीड़ित का पीड़ित होना ही काफी
नहीं होती है ! मरी हुई समाज की
संवेदनाएँ जगाने के लिए
जब कोई घटनाएं हो चुकी होती हैं घटित
लूट ली गयी होती है बेटी की आबरू,
तब हम लगाते है आवाज इंसाफ के लिए
दिखाते है कि हम समाज के जिम्मेदार बुद्धिजीवी है,
जो लड़ते है लड़ाई शोषण और अन्याय के विरुद्ध,
बराबरी और सम्मान का!
अचानक आक्रोश से,
जाग जाती हैं हमारी मरी हुई संवेदनाएँ ,
निकल पड़ते है हम केंडल जलाने के लिए
मुर्दे हुई समाज को जगाने के लिए
चंद दिनों बाद फिर मर जाती हैं
हमारी संवेदनाएँ
फिर जब कोई घटना आती है सुर्खियों में
फिर लूटी जाती है कोई बेटी
तब फिर जागृत हो जाती हैं
हमारी मरी हुई संवेदनाएँ
~गावस्कर कौशिक
सुकमा, छ्ग
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