Wednesday, September 30, 2020

संतोष प्रधान "कचंदा" की रचना- जाग री नारी

नाम-    संतोष प्रधान "कचंदा"
स्थान-  कचंदा
जिला-  जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा-  मुक्तक कविता
शीर्षक- जाग री नारी

          जाग री नारी

कब तलक सोयेगी , अब तो  जाग री  नारी ।
तुम्हीं    से  तो बनी,   ये दुनिया सारी ।।

पलटा   देगी  दुनिया, तुझमें है इतना      दम ।
बुद्धिवती है , बलवती है , नहीं किसी से कम ।।

तू ही तो जग जननी है, सृजन करना तेरा काम ।
तेरे इस पुनीत कर्म को , ईश्वर ने भी किया प्रणाम ।।

कुछ मुर्ख नादानों ने किया तेरा अति अपमान ।
अभिशाप कहा , अबला कहा और कहा अज्ञान ।।

किया   तूने    सदा सब्र , सहती रही संहार ।
पर   कभी  न आया , बदले का विचार  ।।

देश  तुम्हें    पुकारे , आगे आओ जग महतारी ।
कर ले कोई काम नया , अब आयी तेरी बारी ।।

प्रगति   की  ओर , अब  तो जा री नारी ।
बढ़ा देश को आगे , निभा अपनी भागीदारी ।।

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