Tuesday, September 29, 2020

सावित्री यादव "सावि " की रचना- चंचल मन

विषय -भयग्रस्त मन 
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
                बिलासपुर छ. ग.                      
  शीर्षक _चंचल मन 

मन तू बहुत चंचल है कभी सपने झूठे देखता है|
कभी सच को नहीं मानता है |
तेरी चंचलता से हम बहुत घबरा जाते है |
मन तू बहुत चंचल है |

रंग बिरंगे ख्वाब दिखाकर  इस मन को बहकाता है 
फिर हकीकत की धरती पर ला छोड़ जाता है  
मन तू बहुत चंचल है |

कभी देखे अनगिनत तारे कभी सपने अनोखे है |
कभी लगता सब पुरे होंगे कभी लगता सब धोखे है |
मन तू बहुत चंचल है |

कभी परिंदे सा उड़ता दूर गगन  में, 
कभी जमी  में  जख्मी हो जाता है |
मन तू बहुत चंचल है | 

नहीं सुनता किसी की बस अपनी बात मनवाता है |
साँझ सबेरे हर पल  अपनों की याद दिलाता है |
मन तू बहुत चंचल है | 


तू कभी ना धोखा देता पर धोखा तू खा जाता है|
सच को झूठ और झूठ को सच ये  मन मान क्यों जाता है |
मन तू बहुत चंचल  है |

कलियों सी मुस्कान बिखेर करआँखों में आंसू भर जाता है |
होठो  की मुस्कान छीन फिर मन को बहलाता  है |
मन तू बहुत चंचल है |

क्यों तू हमें भटकाता  है | 
मीठे मीठे सपने दिखाकर फिर कंही छिप जाता है | 
ये मन तू हमें सताता है |
मन तू बहुत चंचल है |
         रचनाकार  _ सावित्री यादव  "सावि "
                       बिलासपुर  छ.  ग. 
                  

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