विषय -भयग्रस्त मन
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक _चंचल मन
मन तू बहुत चंचल है कभी सपने झूठे देखता है|
कभी सच को नहीं मानता है |
तेरी चंचलता से हम बहुत घबरा जाते है |
मन तू बहुत चंचल है |
रंग बिरंगे ख्वाब दिखाकर इस मन को बहकाता है
फिर हकीकत की धरती पर ला छोड़ जाता है
मन तू बहुत चंचल है |
कभी देखे अनगिनत तारे कभी सपने अनोखे है |
कभी लगता सब पुरे होंगे कभी लगता सब धोखे है |
मन तू बहुत चंचल है |
कभी परिंदे सा उड़ता दूर गगन में,
कभी जमी में जख्मी हो जाता है |
मन तू बहुत चंचल है |
नहीं सुनता किसी की बस अपनी बात मनवाता है |
साँझ सबेरे हर पल अपनों की याद दिलाता है |
मन तू बहुत चंचल है |
तू कभी ना धोखा देता पर धोखा तू खा जाता है|
सच को झूठ और झूठ को सच ये मन मान क्यों जाता है |
मन तू बहुत चंचल है |
कलियों सी मुस्कान बिखेर करआँखों में आंसू भर जाता है |
होठो की मुस्कान छीन फिर मन को बहलाता है |
मन तू बहुत चंचल है |
क्यों तू हमें भटकाता है |
मीठे मीठे सपने दिखाकर फिर कंही छिप जाता है |
ये मन तू हमें सताता है |
मन तू बहुत चंचल है |
रचनाकार _ सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
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