Tuesday, September 29, 2020

सूर्य प्रकाश पाटिल की रचना- मन

रचनाकार  सूर्य प्रकाश पाटिल
जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़
विधा छंद मुक्त कविता
विषय भय ग्रस्त मन (अतिशयोक्ति अलंकार)

प्रकृति ने दिए उपहार हमें,
       बेसुमार, बेहिसाब फिर भी।
हमने किया लगातार,
        प्रकृति से छेड़छाड़।
दोहन, तिरस्कार,
        नतीजा तो भोगना ही था।
आज हर एक इंसा एक दूसरे से,
      भयभीत है भय खाता है।
कोरोणा इसे कही होगा,
        तो मुझे ना हो जाए।
यह सोचकर इंसा,
        मन ही मन भय खाता है।
यदि बीमार नहीं है मानव फिर भी,
        तरह तरह की दवाई खाता है।
बीमार हो जाए तो,
         अस्पताल के नाम से घबराता है।
क्योंकि मानव मन से भयभीत,
         खुद से डरा हुआ है।
लॉक डॉउन करें सरकार तो,
        उसका पालन मुश्किल होता है।
अपने ही घर में रहना,
             लोगों का मुश्किल होता है।
खाली हो तो तरह तरह के बात,
         सोशल मीडिया में फैलाते हैं।
खुद और लोगों के मन में,
          भय बैठाते है।
आज इंसा के मन में भय इतना है,
          लक्ष्न दिखने पर भी टेस्ट से भय खाता है।
आज आम आदमी के मन में,
      कोविड का कम कोविड़ अस्पताल का भय इतना है।
अन्तिम छण में टेस्ट करवाता हैं,
            या सीधे शमशान जाता है........


सूर्य प्रकाश पाटिल

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