रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-आलेख लेखन
विषय-मेरा गांव/मेरा शहर
गांव से मेरा लगाव आज भी बहुत है क्योंकि बचपन के वो सुहाने दिन ही तो हम सही तरीके से जीते हैं। मेरा गांव बहुत ही सुंदर कल भी था और आज भी है।शहर से बहुत दूर बिल्कुल शांत और सुरम्य ।पर गांव का जीवन बहुत कठिन था खासकर पढ़ाई के लिए कहीं कोई सुविधा नहीं शहर वहां से तकरीबन 96 किलोमीटर पड़ता था और सिर्फ एक ही बस मेरे गांव के पास वाले गांव तक आती थी उसे भी बीच मे बदलना पड़ता था तब कहीं शहर पहुंचना संभव हो पाता था। उस बस के लिए सुबह के 3 बजे उठकर पैदल 2 किलोमीटर जाकर पकड़ना जीवन के सबसे दुखदाई पलों में से एक है क्योकि वह सुबह के 4 बजे निकलती थी ।जिस दिन जाना होता था उस रात नींद ही नही आती की कहीं बस निकल ना जाये।
गांव में तब सुख सुविधा का कोई साधन ना था ।चूल्हे का खाना सबसे स्वादिष्ट होता था,आइसक्रीम वाले का इंतजार घंटो रहता ।गर्मियों में कई -कई दिन बिजली नही रहती पर कोई परवाह नही हम सब भाई-बहन ताश खेलकर समय निकाल लेते थे।गांव का स्वच्छ हवा शरीर को ऊर्जा से भर देती ,नदी और तालाब में नहाने का भी अपना मज़ा था।अपने बाड़ी का फल -सब्जी खाना तथा हर तरह का मौसमी फलों का मज़ा लेना ।गांव में तब एक -दो घरो में ही टी. व्ही. था सब मिलकर एक साथ फ़िल्म देखते थे ,फ़ोन के बारे में गांवों में सिर्फ सुने थे।
फिर शादी कर में एक छोटे शहर में आ गई जहां जरूरत का हर चीज आसानी से मिल जाता पर अब ये शहर भी इतनी विकसित होते जा रही है कि हर दिन नए मल्टीप्लेक्स, रेस्टोरेंट, मॉल खुलते जा रहे हैं।हम भी अब बिजली के बगैर 5 मिनट भी नही रह पाते बिना कार के सफर मुश्किल लगती है।पर सुविधाएं जितनी भी हो गांव वाली जिंदगी नही दे सकती।
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