पता - पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - १० साल पहले का मेरा गांव
शीर्षक - गांव में शहरी रंग
छत्तीसगढ़ी कहावत है - "कोस - कोस म पानी बदले दस कोस म बानी " । ऐसे ही हर दशक में वर्तमान स्थिति से भविष्य का बदला स्वरूप दिखता ही है।
दस वर्ष पूर्व का मेरा गांव जहां आम का घना बगीचा था। मुख्य मार्ग के दोनों ओर विस्तृत खुला मैदान, खेत के मेड़ों में सघनता में उगे बबूल , करंज व अर्जुन के पेड़ , जिससे गांव की एक अनुपम छटा दिख पड़ता। गौठान में बूढ़ा बरगद अपने रेशों के मूल में खड़ा था। मानो अतिथियों का सत्कार करते घर का अग्रणी की भूमिका पर हो । पास ही २४ घंटे प्राणवायु प्रदान करने वाले पीपल की घनेरी मधुर ध्वनि करते शीतल छांव में बच्चे गिल्ली -डंडा खेलते अनायास ही दिख पड़ते। एकता युवा मित्र मंडल के युवाओं द्वारा तालाब किनारे लगाए पेडों के पौधे व फूलों की क्यारियां भी किशोर से युवा हो चले थे और अपने पूर्ण यौवन में आकर्षण का केन्द्र बिंदु हुआ करता था। जहां शीतल छाया में बैठ युवा ही नही बुजुर्ग भी मन शांतकर भिन्न - भिन्न पर चर्चा किया करते थे। सड़क किनारे खुले मैदान में नर्सरी का नवस्वरूप गढ़ा जा रहा था। धमतरी के निकट बसे बालोद जिले का मेरे गांव में शहर का रंग चढ़ रहा था। गालियां सिमेंटीकृत हो चला था, घरों में जलापूर्ति के लिए नल लगने लगे थे , पंचायत भवन का जीर्णोद्धार हो चुका था।कई सामाजिक व एक वृहद सामुदायिक भवन और प्रस्तावित बी.एस.एन.एल. का टॉवर बनना शुरू हो चुका था।लेकिन गलियों में पानी निकासी का साधन नहीं बन पाया , जो आज भी यथावत है। जिससे गंदा पानी गलियों में बहते रहते हैं और कई जलजनित , जीवाणुजनित रोगों का कारण आज भी बनी हुई है।
चौक - चैराहों पर बुजुर्गों का चौपाल शाम को और रात के खाना खाने के बाद देर रात तक अक्सर देखने मिल जाता था।प्रत्येक लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बन ततपरता से आत्मीयता दिखाते थे। बच्चे -युवा बड़ो को देख अपने पैन-गुटखा जैसे कम नशीली पदार्थों को भी छुपाते नजर आते। बुजुर्गों के सामने अपने हम उम्र को भी गाली नही देते थे। विभिन्न पर्वो में भी आत्मीयता और भाईचारा देखते ही बनता था। अब हर जेब मे मोबाइल , हर घर टी.वी.और विलाशिता के सारे साधनों का बढ़ता दायरा समाज और जीवन मे अपनों के बीच खाई बनाता चला जा रहा है।मैं ये नही कहता कि ये सारी बातें अब मेरे गाँव मे नही है पर अब शायद मेरे गाँव में शहरी रंग पूरी तरह चढ़ गया है, तभी तो गांव की तरह दिखता मेरा गांव बदल गया है।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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