स्थान -दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्त
शीर्षक- *प्रकृति का कहर*
प्रकृति का दोहन कहें
या कहें खिलवाड़,
आपदा के लिये मानव
स्वयं भी हैं जिम्मेदार,
सृष्टिकर्ता ने बनायी,
सबकी अपनी किस्मत,
फिर ज्यादा के लालच में,
हुआ धरती माँ का शोषण।
आता ऐसा सैलाब देखो
सब डूबो देता जन-धन,
भूकंप की कंपन से भी तो
दुनिया काँपती थर-थर ।
ऐसा ही सुनामी ने बरपाया कहर,
सब कुछ बहा ले गयी थी लहर ,
पर एक मूर्ति साबूत दिखाई पड़ी
आश्चर्य हुआ इस जलजले में ये कैसे बची रही,
छूकर देखा हौले से तो अंदर
जान अभी बची हुई थी,
खोकर अपनों को ही वह
बूत के जैसे जड़ हुई थी,
बहते देखा ऊँचे मकान, कुछ
कपड़े उपर तैर रहे थे,
दुःख का सैलाब तब आया जब वो बहते मानव के शरीर थे।
देख ऐसा भयावह मंजर
हर प्राणी सदमे में था,
प्रकृति लेती है ऐसा
रौद्ररूप जब,
सम्हलना मुश्किल होता
मानव का तब।।
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