जिला :- महासमुंद
विषय :- प्राकृतिक आपदा
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- जल मग्न संसार
अलंकार :- संदेह अलंकार
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वर्षण से निरंतर जग में,
जल मग्न संसार हुआ।
या फिर सकल जगत में देखो,
रत्नेश का विस्तार हुआ।
डूब गए हैं खेत खलिहान,
गलियों में नदियां बह रही।
चल रही नावें गलियों में,
और मानव जीवन ठहर गई।
पानी पानी जग हुआ है,
या हुआ है जग सुख चैन का प्यासा।
डूब गए आसरा सबका,
छाई मानव मन में निराशा।
मन भयभीत हुआ देखकर,
बरसे निरंतर वर्षा रानी।
है वर्षण भयंकर या फिर,
लगती मन को यह सुहानी।
है सृष्टि का क्रोध जगत को,
आपदाऐं जगत में यह सकल।
या है यह मानव जीवन में,
उनके ही कुकर्मों का फल।
पर्यावरण प्रदूषण में जब जब,
मानव कर्म का योग रहा।
इसलिए करम का मारा मानव,
आपदाओं को भोग रहा।
छेड़छाड़ कर प्रकृति में,
खो दी मनु ने निज संपदा।
अस्त व्यस्त संसार हो गया,
आई जगत में ज्यों विपदा।
बाढ़ के पानी में बहती संपदा,
या सुख चैन सकल ही बह रहा।
त्राण हरो है जगत के स्वामी,
मानव त्राहिमाम कह रहा।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने मानव जीवन में बाढ़ की प्राकृतिक आपदा का वर्णन करते हुए उस मार्मिक दृश्य का चित्रण करने का प्रयास किया है।
काव्य अलंकरण के लिए संदेह अलंकार का प्रयोग किया है।
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