Saturday, September 19, 2020

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- सड़क

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
विषय :- सड़क
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- सड़कों को सड़क ही रहने दो।

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कागजी दस्तावेजों में सजी,
सड़कें गांव - गांव, शहर - शहर।
भ्रष्टाचारी कांक्रीट से बनी सड़क,
कबतक रहती टिक कर।
          जरा सी बारिश, प्रशासन की,
          पोल खोलने को काफ़ी है।
          जनता ही जानती है सड़कों में,
          साल भर में कितना ही बाकी है।
कुछ लापरवाही लोगों की,
कहीं भ्रष्टाचारी नेता बेधड़क।
भ्रमित है इस बात से राही,
सड़कों में गड्डे है, या गड्डों में सड़क।
          ऊबड़-खाबड़ इतने की,
          नए वाहन भी तरस खाने को कहते हैं।
          सत्ताधारी चुनावी जंग में,
          बस वादों में सड़कें बनते हैं।
गर हो जाता है सड़क पास,
गुजर जाते हैं बनने में वर्ष पाँच।
खेल कर चुनावी दाव सड़क की,
बचा लेते नेता निज आँच।
          उसपर चलाती है जनता हमेशा,
          कैजव्हील विकास के नाम की।
          कुछ महीनो में ही टूट कर,
          रह जाती है सड़कें बस नाम की।
घट जाती ही दुर्घटना अनायास ही,
खो देता है कोई निज जीवन।
जीवन दांव पर लगा देने वाला,
कहां तक सही है जग में गबन।
          हे सड़कों के सौदागर,
          क्यों निज के उदर को भरते हो।
          सड़कों का सौदा करते हो,
          या जीवन का सौदा करते हो।
सड़कें तो जरिया है मनवा,
मंजिल तक ले जाने को।
पर सड़कों पर राजनीति चल रही,
बस दो पैसे कमाने को।
          सबकी सुविधा को बने हैं,
          सड़कों को सड़क ही रहने दो।
          कि सहमा ना रहे मनु मंजिल की राह में,
          राही को बेधड़क रहने दो।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने सड़कों का जिक्र करते हुए कहा है कि सड़कें मनुष्य को मंजिल तक ले जाती है। लेकिन आज भ्रष्टाचार व मानव के निजी स्वार्थ के कारण सड़कों का स्वरूप बदल गया है। अंततः कवि यह आग्रह करते हुए कहते हैं कि सड़कों को सड़क ही रहने दो।

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