ग्राम- बुलाँकी
जिला- रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा -कविता
विषय -शांति चेतना
शीर्षक- "सीख"
दिनांक03/09/2020
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*सीख*
ऐसे व्यवहार बनाइए,
जामे नेकी का वास ।
मृदु वचन हिय हिलोरे ,
मन गदगद् हो जाए।
अपना -पराया त्याग कर,
सब संग प्रीत लगाय।
जैसे चंदन मस्तक लगे,
देह शीतल हो जाय।
इतना धन मैं कमाऊँ,
जामें तृप्ति का हो वास।
तृप्ति धन से बड़ा न कोई,
न मांँगू धन विशाल।
धूप छाँंव परिवर्तन जिंदगी,
दुःख -सुख में बाँंट लें।
अल्प दिवस नश्वर जिंदगी,
सब संग प्रीत कर ले।
विलासिता संयम कर,
आवश्यकता का हो पहचान।
जो आवश्यकता को समझे,
वही सफल जीवन बिताय।
न रहे मन मे बैर दुश्मनी,
घट-घट प्रेम जगाय।
जैसे सुमन बिखेरे खुशबू,
चमन सुगंधित हो जाए।
उपकार कर उपकारी बने,
मानवीयता बने पहचान।
आडंबर विछिन्न हो जाए,
सुनो सकल जहाँन् ।
धन दौलत डेहरी जैसे छाँव,
कभी आते कभी जाते हैं।
धन कभी स्थाई नहीं रहता,
फिर भी मन क्यों लगाते हैं।
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व्याख्याः- इस कविता में कवित्री सीख अर्थात लोगों को व्यवहारिक जीवन जीने के लिए इंगित की है ताकि मनुष्य प्रेरणा लेकर अपनी जिंदगी में सुख शांति से जी पाए।
इस कविता में दृष्टांत अलंकार कहीं -कहीं दिखाई गई है।
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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