संबलपुर, जिला-कांकेर(छ. ग.)
आलेख
10 वर्ष पहले का मेरा गाँव
*वो प्यारा गाँव*
"जाने कहाँ गया वो गाँव,
वो बरगद,पीपल की छाँव।
बड़े,बूढ़ो, बच्चों का प्रेम भाव,
वो भोला भाला मृदु स्वभाव।
जहाँ कागज की होती थी नाव,
वो प्यारा-प्यारा सा मेरा गाँव।
मन मेरा ढूंढ रहा वो गाँव।
मेरा गाँव संबलपुर गाँव नहीं बल्कि एक प्राचीन कस्बा है। 1940 तक इसे तहसील का दर्जा प्राप्त था ।हम इसे ऐतिहासिक भी कह सकते हैं ।कांकेर रियासत की सबसे अधिक जनसंख्या वाला गाँव ....प्रशासन का एक केंद्र बिन्दु ...मालगुजार यही रहते थे। गाँव से सात किलोमीटर दूर जंगलों के बीच बाँसला कंडरा राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी ।यहाँ माँ दन्तेश्वरी के चार गढ़ो में से एक गढ़ भी स्थापित है।बांसला जाने के लिए पहले संबलपुर आना पड़ता है।यह कस्बा बहुत पुराना है।राजा भानुप्रताप देव ने मेरे गाँव से तीन-चार किलोमीटर पहले एक चौराहा को भानुप्रतापपुर नाम से बसाया।जो 1967 में अस्तित्व में आया।आज वहीं तहसील और विकासखण्ड मुख्यालय बन गया है।जिसके कारण गाँव का विकास रुक गया।
वैसे मेरा गाँव और तहसील मुख्यालय लगभग मिल सा गया है।
इस गाँव में सभी जाति ,धर्म के लोग रहते हैं ।पहले आपस में सब का प्रेम व्यवहार और सब एक दूसरे से रिश्ते से बंधे होते थे, और अब भी बंधे है, मगर दस वर्ष पहले और अब में अंतर तो बहुत आया है । *भौतिक दृष्टि* से देखा जाएं तो गाँव का परिदृश्य ही बदल गया है। पक्के मकानों की होड़ सी लग गई है।हर गली में सी.सी .रोड़ बन गया है।अधिकांश घर आधुनिक सुख सुविधाओं से भरा हुआ है । *आर्थिक दृष्टि* से भी बहुत परिवर्तन आया है ,मनरेगा जैसे और कई शासकीय योजनाओं के कारण जीवन स्तर का ग्राफ काफी बढ़ गया है। बच्चों को पढ़ाने लिखाने में भी माँ-बाप का प्रयास प्रशंसनीय है । *सामाजिक दृष्टि* से देखा जाएं तो समाज में बिखराव देखने को मिलता है ।आपस में भाई भाई में पटती नहीं ।माँ-बाप को कोई पूछता नहीं ।समाज टूटने के कगार पर आ गया है । *नैतिक दृष्टि* से देखा जाए तो सबसे ज्यादा पतन नैतिक मूल्यों का ही हुआ है ,।मानवोचित गुणों का पतन होते जा रहा है ।एकल परिवार का बढ़ता प्रभाव, स्वार्थ से भरे लोग ,समाज को पतन की ओर ले जा रहे हैं। *राजनैतिक दृष्टि* से देखा जाए तो हर गाँव में नेता पैदा हो गए हैं या कहिए हर घर में नेता पैदा हो गए हैं। नेतृत्व क्षमता तो बढ़ी है।पंचायती राज भी इसका एक बड़ा कारण है ।आज की गंदी राजनीति ने नेता की परिभाषा ही बदल दी है ।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि मेरा प्यारा गाँव अपना प्यारा सा स्वरूप खो बैठा है ।गाँव की मिट्टी का सोंधापन, रिश्तों की मिठास, आपसी भाईचारा, सहयोग, प्रेम, निस्वार्थ भाव ,सब कहीं खो गए हैं।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ. ग.)
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